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जौनपुर समाचार:जौनपुर के गाजना गांव में रहने वाले बराहर यादव ने सीमित अध्ययन के बीच गांव की मिट्टी में कुश्ती सीखकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है। जूनियर एशिया में रजत पदक जीतने वाले सौरभ अब सीनियर विश्व प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे हैं।
अंग्रेज़ी: घर में रेसलिंग के मैट पैसे तक के नहीं थे, लेकिन आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना था। फ़्रैंचाइज़ की कमी ने रास्ता ज़रूर मुश्किल बना दिया, लेकिन फ़्रैंचाइज़ी को फ़्राईफ़ नहीं कर सका। जौनपुर के गाजना गांव के रहने वाले पहलवान सौरभ यादव ने कभी गांव की मिट्टी में कुश्ती के दांव-पेंच सीखे थे। आज वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रतिनिधि कर रहे हैं।
जूनियर एशिया में रजत पदक विजेता सौरभ अब सीनियर विश्व प्रतियोगिता कजागिस्तान में पदक पदक की तैयारी कर रहे हैं। उनका सपना सिर्फ कुश्ती कुश्ती नहीं, बल्कि एक दिन के ओलंपिक में देश के लिए मेडल जीतना है। सौरभ यादव ने बताया कि उनके पिता खुद रेसलर थे. उन्हें देखकर उनके मन में भी कुश्ती की प्रति रुचि पैदा हो गई। पिता ने ही उन्हें शुरुआत में कुश्ती के लिए प्रेरित किया। इसके बाद वह कोच के पास पहुंचे, जहां उन्हें आगे बढ़ने का मौका मिला। धीरे-धीरे उनकी यात्रा आगे बढ़ी और वह स्पोर्ट्स कॉलेज तक पहुंच गई।
चोट ने बोरा का खेल छोड़ा
हालाँकि, शुरुआत में उनके पास अभ्यास के लिए जरूरी प्रश्न नहीं थे। गाँव में मैट उपलब्ध नहीं था, इसलिए उन्होंने मिट्टी में ही कुश्ती का अभ्यास किया। जिस मिट्टी में उन्होंने अपने सपनों को आकार दिया, उनके संघर्ष की पहली गवाहियाँ बनीं। सीमित के बावजूद उन्होंने मेहनत जारी रखी और अपने खेल को बेहतर बनाने में सफल रहे। बोरा का सफर आसान नहीं रहा. अभ्यास के दौरान कई तरह की भावनाएं सामने आईं। सबसे मुश्किल समय तब आया, जब उन्हें चोट लग गई। चोट इतनी गंभीर थी कि उन्हें सर्जरी करानी पड़ी। इस दौरान उनके खेल पर भी असर पड़ा.
मेहनत के दम पर जूनियर एशिया प्रतियोगिता में पदक जीता
किसी भी खिलाड़ी के लिए चोट लगना और मैदान पर वापसी बड़ी चुनौती है, लेकिन सौरभ ने हिम्मत नहीं हारी। अब वह पूरी मेहनत के साथ अपने खेल को आगे बढ़ा रही हैं। उनके परिवार ने भी इस यात्रा में उनका साथ दिया। सौरभ यादव ने अपनी मेहनत के दम पर जूनियर एशिया प्रतियोगिता में रजत पदक जीता है। इसके बाद उन्होंने जूनियर विश्व प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया, हालांकि वहां उन्हें पदक नहीं मिल सका। इस हार से निराशाजनक स्थिति के बजाय उन्होंने अपनी कमियों को विकसित किया और आगे बेहतर प्रदर्शन करने का लक्ष्य बनाया।
अब देश के बाहर दिखाएंगे दम
वर्तमान में सौरभ कॉलेज स्थित जीएसडब्ल्यू में प्रैक्टिस कर रहे हैं। अब वह सीनियर विश्व प्रतियोगिता में भाग लेने की तैयारी में हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस बार वह मेडल के तौर पर देश का नाम रोशन करेंगे। सौरभ कहते हैं कि संघर्ष तो बहुत हो रहा है, लेकिन प्रश्नों से लाभ ही होता है। अब उनका लक्ष्य सीनियर लेवल पर मेडल जीतना और आगे के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना है।
गांव की मिट्टी से शुरू हुआ उनका सफर आज इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुका है। कभी-कभी अभ्यास के लिए मैट की सुविधा नहीं थी, लेकिन उन्होंने इंडोनेशिया के आगे चलकर नहीं देखा। अब उनकी मेहनत और लगन उन्हें वहां तक जहां तक प्रशिक्षण की कोशिश कर रही है, जहां उन्होंने ओलंपिक में पदक हासिल कर देश का झंडा बुलंद किया है।








